Thursday, November 26, 2015


सर्दियों में प्रातः काल एक लीटर कुनकुना पानी अन्दर से आनंद देता है लेकिन बार बार बहार भी भेजता रहता है... ‪#‎लघु_शंका‬

Sunday, November 15, 2015

युद्ध कर लें.. स्वयं से |

चलो
शांति हेतु,
युद्ध कर लें.. 
स्वयं से |

Monday, September 14, 2015

खब्बू, लतरी ... लेफ्टी !

मैं खब्बू हूँ | लिखना और खाना तो घरवालों ने डांट कर सिखा दिया.. बाकी काम जैसे ब्रश करना, गेंद फेंकना, आदि लतरी हाथ से ही चालू है smile emoticon
खब्बू एसोसिएशन जिंदाबाद smile emoticon
फ्रिज मेरे हिसाब से सही खुलता है दाहिने से दरवाजा खोलना और बाएं हाथ से सामान उठाना, किन्तु कैंची परेशान करती है |
बैटिंग राईट , बोलिंग लेफ्ट | सब्जी मैं दोनों हाथों से काट लेता हूँ... क्योंकि लिखने के कारन चाकू दाहिने से भी सहजता से पकड़ लेता हूँ |

Thursday, July 30, 2015

भईय्ये कहाँ थे अबतक ?? :)

भाजपा की जब सत्ता आजाती है तो इसका अल्पसंख्यक मोर्चा सक्रिय होजाता है और इसके सदस्यों की संख्या भी बढ़ने लगती है (?) सत्ता रहते-रहते ये भरपूर फायदा उठाते हैं (अटल युग का अनुभव) और सत्ता जाते ही ये अन्य 'सेकुलर' दलों के लिए काम करने लगते हैं |

अब अल्पसंख्यक मोर्चा फिर ऊँगली कटा कर शहीद होने का नाटक करने लगा है | #Rampur
 
किन्तु मोदी युग में शायद इनकी दाल न गले | होता यह है कि इनकी 'सक्रियता' से भावनात्मक रूप से जुड़े और सक्रिय कार्यकर्ता आहत अनुभव करता है और अपने आप को पार्टी की गतिविधियों से सीमित कर लेता है | चूँकि पार्टी सत्ता में होती है तो वह भी इन रूठे लोगों पर नजर रख नहीं पाती और संकट काल में उसे नुक्सान होजाता है |

रामपुर में भाजपा इसका अनुभव कर चुकी है जब 2009 लोकसभा चुनाव में सिर्फ साठ हजार मतों पर सिमट गयी थी पार्टी.
अमित शाह जी ने शायद इस बात को भांप लिया था और टिकट बंटवारे में इसका ख्याल रखा और भाजपा को इसका भरपूर लाभ भी मिला |
आशा करता हूँ कि अल्पसंख्यकों के सम्मान को बरक़रार रखते हुए मौका परस्तों को स्पष्ट संकेत दे दिए जाएँ | उनसे पूछा जाये कि "भईय्ये कहाँ थे अबतक ??" :)

Monday, June 8, 2015

जनता को आइना कौन दिखायेगा ?

जनता को आइना कौन दिखायेगा ??
जनता में भी तमाम विकृतियाँ आगई हैं, मुफ्तखोरी उनके रग रग में बस गयी है, जिसका फायदा राजनेता उठा रहे हैं, उन्हें भारत के खजाने में से साइकिल, चावल, टीवी, wifi मुफ्त में देकर अरबों खरबों की संपत्ति पर कुंडली मार लेते हैं |

चुनावी राजनीती करने वाले नेता लोग जनता को आइना नहीं दिखा सकते | वो काम तो गाँधी, जय प्रकाश नारायण जैसे लोग ही कर सकते हैं, किन्तु दुर्भाग्यवश इनके आंदोलनों को कोई न कोई शातिर अपने लिए इस्तेमाल कर लेता है |
अभी अन्ना को ही लीजिये, सब कुछ ठीक था लेकिन एक शातिर कजरी ने इस आन्दोलन को सैबोटाज कर लिया और परिणाम आपके सामने है |
अन्ना जनता को जिस गन्दगी से बचाना चाहते थे कजरी उसी गन्दगी (मुफ्त मुफ्त मुफ्त का नारा) के सहारे मुख्यमंत्री बनगए |

Saturday, June 6, 2015

आरक्षण |

यदि आप जाति के आधार पर आरक्षण लेकर सुविधा उठाएंगे तो फिर उसके ताने भी सुनने ही होंगे , स्वाभिमान कहाँ से आयेगा.
यदि आप निरपेक्ष भाव से समाज का उत्थान चाहते हैं तो आरक्षण को आर्थिक आधार पर कर देने में क्या गलत है ??
मैं दलित नहीं हूँ लेकिन अपने कई दलित मित्रों से गरीब हूँ. मेरे बच्चे की फीस मैं मुश्किल से दे पाता हूँ तो क्या मुझ पर तरस नहीं आती आपको?
क्या एक अधिकारी का बच्चा आरक्षण लेता रहेगा और एक उच्च जाति का गरीब सुविधाओं से वंचित रहेगा ?? यदि इतिहास में दलितों के साथ अन्याय हुआ तो क्या अब आप वही चक्र शुरू करना चाहते हैं ??
अंग्रेजों ने हमको पीटा , मारा, काटा, हम पर राज किया , तो क्या आज कोई अंग्रेज मिल जाये तो हम उसके साथ दुर्व्यवहार करें?? वो जमाना और था यह जमाना और है , आज हम भेदभाव नहीं करते और न ही चाहते हैं कि हमारे साथ भेदभाव हो |
जातिगत आधार पर जो आरक्षण है वह भी तो स्वयम दलितों में भेदभाव पैदा कर रहा है ... जो आगे निकल गए वे स्वयं अपने ही गरीब दलितों का हक़ मर कर आरक्षण का लाभ लिए जारहे हैं. इसलिए यदि सच्चा न्याय चाहते हो तो आर्थिक आधार को अपना लो और आरक्षण को सिर्फ पच्चीस पर्सेंट कर दो. यदि आपको भरोसा है कि आपकी जाती गरीब है तो ज्यादा लाभ उसे ही मिलेगा.
आरक्षण तो सिर्फ दस वर्ष के लिए था... तो फिर इसे अब क्यों बढवाना चाहते हो ??

पेंटिंग |

वो काफी दिनों से एक पेंटिंग बना रहा था | थोड़े दिनों बाद ही पता चल गया कि कोई ख़ास ज्ञान है नही उसे पेंटिंग बनाने का किन्तु उसके पास कैनवास, रंग और ब्रश सब कुछ था |

मेरे पास सिवाय कमियां निकालने के और कुछ काम नहीं था | मैं करता भी क्या, पेंटिंग बनाने का अधिकार तो उसे दिया गया था न |

धीरे धीरे लोगों ने भी महसूस किया कि ये नहीं बना सकते पेंटिंग, इनके बस की नहीं है, ये सिर्फ टाइम पास कर रहे हैं तो जूरी ने ये काम मुझे सौंप दिया | मेरी मजबूरी थी कि उस बेकार, बदरंग, अधबनी पेंटिंग को ही सुधारुं | और कोई विकल्प नहीं था | मुझे उसका थीम भी बदलना था, तो मैंने पहले उसमें ही सुधार करने का काम शुरू किया |
अभी चार दिन बीते नहीं कि वे ही ज़ालिम मुझसे सवाल कर रहे हैं कि पेंटिंग दिखाओ |
मैं क्या करूँ?? उन्हें अनसुना कर पेंटिंग पर अपना काम जारी रखूं या काम छोड़कर सफाई देता रहूँ?
...............................................................................................................................

मेरी इस कहानी से कहीं आपको देश (पेंटिंग), कांग्रेस और वर्तमान में मोदी तो नहीं याद आरहे ?
आ ही रहे होंगे | आखिर कांग्रेस से उस पेंटिंग बनाने का अधिकार छीन कर आपने ही तो मोदी को सौंपा है | :) 

Monday, May 18, 2015

गोला बारूद बनाम मेक इन इंडिया |

युद्ध बहुत महंगा होता है ... एक मिसाइल जो हम दागते हैं वह 10 करोड़ तक का हो सकता है | एक तोप का गोला भी लाखों का पड़ जाता है | बन्दुक से निकली एक गोली सैकड़ों रुपये की होती है | और इस सब का भण्डारण भी महंगा होता है |
जबकि एक स्कूल और अस्पताल का खोला जाना और उसे चलाया जाना अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता है और उपयोगी भी रहता है |
हथियार बनाने वाली एक बहुत बड़ी लॉबी है जिसका धंधा ही सिर्फ डर और अविश्वास पर चलता है |
दो देशो या गुटों के बीच जब युद्ध होता है तो दोनों तरफ से लगभग एक ही 'मेक' के हथियार होते हैं और उनके 'मैन्युफैक्चरर' भी एक ही होते हैं |
यानी वे तो दोनों के यार हैं | बस पागलपन तो लड़ने वालों पर ही सवार होता है |

आजकल सुनने में आरहा है कि हमारे देश में सिर्फ 20 दिन का गोला बारूद ही बचा है और ऐसा माहौल बनाया जारहा है कि सरकार को अपना आयुध भंडार बढ़ाना चाहिए | ये हथियार लॉबी का ही प्रोपेगंडा होसकता है जो सोशल मीडिया के जरिये सरकार पर दबाव बनवा कर अपना माल बेचना चाह रही है | मोदी जी की प्राथमिकतायें अलग हैं और वे हथियार खरीद कर दलाली लेने के बजाये मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसे अपने महती कार्यक्रमों पर धन लगाना चाहते हैं |
#जयहिन्द 

Sunday, May 17, 2015

सर

गुरु और माता पिता अनंतकाल तक तो नहीं रह सकते इस धरा पर | उन्हें एक न एक दिन जाना ही होता है | इसमें कुछ भी असामान्य नहीं होता | किन्तु वे लोग जब भी जाते हैं अथवा जायेंगे ऐसा लगेगा जैसे थोडा सा "मैं " गया |

मैं जो बना वह अपने गुरुओं और बड़ों का का 'थोडा-थोडा' हूँ |
मैं थोडा कुमार सर बना, थोडा द्विवेदी सर बना, थोडा श्रीवास्तव सर बना , थोडा वर्मा सर बना !
किसी से मैंने धैर्य लिया , किसी से समर्पण, किसी से गंभीरता, किसी से व्यवहारिक सोच तो किसी से स्पष्टता | इन सभी का सम्पूर्ण योग जिस व्यक्तित्व की रचना करता है वह "मैं" हूँ |

मेरे एक #सर "जाने वाले हैं" | ये वे सर हैं जो सबकुछ जानते हैं ... सब कुछ | साहित्य विज्ञानं हिंदी अंग्रेजी गद्य पद्य जीवन का सार ... सब कुछ | वो अपना किया सही और गलत सब जानते हैं |

संकेत मिल चुके हैं और वे चिरनिद्रा के अंतिम क्षणों में हैं | मुझमें से थोडा सा "मैं" निकलने वाला है | स्वयं से ऊपर उठकर सोचूं तो उनके साथ जो सारा ज्ञान और अनुभव जायेगा उसे दुनिया के सारे चिप्स भी नहीं समेट सकते | वह ज्ञान भी चला जायेगा जो अभी तक out dated नहीं हुआ है |

तय नहीं कर पा रहा हूँ कि "अंतिम दर्शन" उस पिछली मुलाकात को ही बना रहने दूं या उनको एक बार और देख आऊँ | उनकी उस जीवंत छवि को अपने मानस पटल पर अंकित रहने देना चाहता हूँ उसे Replace नहीं होने देना चाहता | 

सर कही सुनी माफ़ कीजियेगा |

Tuesday, February 3, 2015

अव्यावहारिक मानदंड और उनका टूटना |

अरविन्द जब राजनीती में नहीं थे तब वे ईमानदारी और शुचिता का उच्चतम मानदंड स्थापित करने की बात करते थे...
जैसे: टिकट वितरण में पारदर्शिता, चंदे में पारदर्शिता, RTI के अन्दर आना, पार्टी में अन्दुरुनी लोकतंत्र आदि |
हालाँकि लगता यही था कि ये अव्यवहारिक सी बातें हैं किन्तु उनकी ये बातें दिल को छूती थीं |

और जब उन्होंने ये करने का प्रयत्न किया, और जैसे जैसे उनकी पार्टी बड़ी होती गयी उन्हें भी लगा कि ये बातें धरातल पर नहीं हो सकतीं...
सो लोकसभा चुनाव में आते आते उन्होंने टिकट वितरण में पारदशिता वाला अध्याय समाप्त कर दिया और कमरे के अन्दर बैठ कर ही टिकट बंटे और बिके |
चंदे में हेरफेर और अनाम कंपनियों से चंदे लेने का खेल शुरू |
RTI के अन्दर आने की घोषणा तो कर दी किन्तु कितनी RTI पेंडिंग पड़े हैं इसका जवाब नहीं देंगे |
और आतंरिक लोकतंत्र की बात का अंदाजा इसी बात से लगा लीजिये कि फाउंडर मेम्बर भी टाटा कह गए |
सच यह है कि अरविन्द भी सिर्फ राजनीती कर रहे हैं और जिन लोगों ने उन्हें उनकी बातें सुनकर ज्वाइन किया था वे ठगे से अनुभव करने लगे.
अब जो रह गए हैं वे सिर्फ उनका वोट बैंक हैं.

Wednesday, January 21, 2015

बन्दर और आदमी का सबक.

आज बंदरों का एक झुण्ड आगया अभी सुबह सुबह |
इन्हें समीप से विचरित करते देखना सम्मोहित करता है |
लेकिन प्रतिदिन तो इनका स्वागत करना भारी पड़ सकता है, रोज आये मेहमान किसे अच्छे लगते हैं भला |
मन हुआ कि कुछ नाश्ता करा दूं लेकिन फिर याद आया कि एक दिन की ये दरियादिली रोज की मुसीबत पैदा कर सकती है |
बंदरों में गजब की याददाश्त होती है, ये घर पहचान लेते हैं और फिर जहाँ से भोजन मिलने की आशा होती है वहां ये उत्पात भी मचाने लगते हैं |
अतः इन्हें यदि कुछ देना ही है तो आबादी के बाहर वाले मंदिर पर ही चढ़ावा के रूप में दिया जाये तो बेहतर |
तो प्यारे बंदरों मेरी ओर से तुम्हे तुम्हारा भोजन मिलेगा किन्तु मिलेगा यथोचित स्थान पर ही |

वैसे पिछले साल दिल्ली वालों ने भी कुछ बंदरों को घर पर बिठा लिया था... लगे नोचने, धरना करने, परेशान कर दिया... पर अबकी बार सबक ले चुके हैं दिल्ली के घरवाले |

समझ तो आप गए ही होंगे ||

Sunday, January 11, 2015

बसपा में भगदड़ |

अन्ना आन्दोलन और मोदी युग के कारण जिस प्रकार की हवा चली है उसमें सबसे जयादा नुकसान हुआ है बसपा का |
बसपा में लगभग भगदड़ सी मच गयी है |
बसपा के पतन की पटकथा तो 2012 से ही लिखी जा रही है किन्तु मायावती मुगालते में रहीं कि लोग सपा से परेशान होकर (anti incumbency) के कारण फिर उन्हें ही सत्ता में लायेंगे |
 किन्तु अब भाजपा का उत्थान देख कर माया के होश उड़े हुए हैं | अब उनसे अपना कुनबा संभाले नहीं संभल रहा |
तेज तर्रार और चुनावी राजनीती करने वाले उनके कार्यकर्त्ता जनता की नब्ज भांप कर भाजपा की ओर रुख कर रहे हैं और जो लोग संगठनिक पदों को संभाल रहे हैं वे पिछली मायावती सरकार में इतना खाए-पिए बैठे हैं कि जनता उनसे बात तक नहीं करना चाहती |

उधर मायावती भी जनता के बीच जाना आज भी अपनी तौहीन समझती हैं और रिमोट से ही संगठन चला रही हैं जबकि उनका बेस वोट मोदी के चमत्कार से अभिभूत है |

बचे खुचे लोग फर्जी आंकड़ों से माया को दिवास्वप्न दिखा रहे हैं |

समझने वाली बात ये है कि "जय भीम" और "जय भारत" का नारा लगाने वाले बसपाइयों के लिए "भारत माता की जय" का नारा कोई परायी चीज नहीं है, और तो और "जय श्री राम" कहना भी उन्हें कहीं से कोई दिक्कत नहीं देता |
जय हिन्द ||

Thursday, November 20, 2014

ऑनलाइन ट्रेडिंग

यदि आज मैं आपको अस्सी के दशक के उन सभी बड़े नेताओं के बयान उलब्ध करा दूं जिन्होंने कंप्यूटर का विरोध किया था तो आपके मन में उनके प्रति कैसे भाव आयेंगे??
खैर छोडिये, कंप्यूटर का युग आना था तो आया ही |

ऐसा ही एक विरोध मैं ऑनलाइन ट्रेडिंग के खिलाफ कुछ लोगों में देख रहा हूँ...
ये खुदरा व्यापारी हैं जिन्हें प्रथम दृष्टया ये नयी सुविधा 'बला' के रूप में दिख रही है |

खैर छोडिये, ऑनलाइन ट्रेडिंग का युग आगया है और ये सर चढ़ कर बोलेगा ही.
ऑनलाइन ट्रेडिंग उपभोक्ता उन्मुखी है अतः इसका चलन बढ़ता ही जायेगा. विरोध करने से कुछ नहीं होगा.. अपितु कालांतर में आपको अपने इस विरोध पर शर्म ही आएगी... 

Monday, June 2, 2014

दही लो दही...

दही लो दही...
पिछले 30 वर्षों से यही आवाज़ सुनता आरहा हूँ... साइकिल पर एक cane में दही रख कर बेचते हैं...
करीब 20 साल पहले इनके आवाज़ लगाने के अंदाज़ की हम बच्चे नक़ल भी करते थे... "दही लो दही" :)
अभी हाल ही में इनका फोटो लिया... मैंने बताया कि फेसबुक पर डालूँगा, बोले साहब जो चाहे कर लेना मुझे क्या पता...
हमेशा खुश रहते हैं और थोड़ी बहुत खेती किसानी करते हैं.
नाम बताया था इन्होने
लेकिन नाम से क्या करना... ऐसे लोगों के काम बोलते हैं.

Thursday, April 24, 2014

आम आदमी पार्टी के एक कार्यकार्ता का दर्द:

430 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करके अरविन्द केजरीवाल सिर्फ बनारस की सीट पर ध्यान दे रहे हैं. बाकी के 429 क्या बलि का बकरा बनने आये हैं. एक तरफ जहाँ मोदी रोज दो दो सभाएं कर रहे हैं वहीँ अरविन्द केजरीवाल सिर्फ बनारस तक सिमट गए हैं. मोदी अपने-एक एक सांसद को जिताने के लिए हाड़तोड़ मेहनत कर रहे हैं और अरविन्द सिर्फ बनारस की कामयाबी को ही अपना ध्येय बना बैठे हैं.

क्या अरविन्द संसद में अकेले जीत कर जाना चाहते हैं? क्या वे नहीं चाहते कि 50-100 लोग संसद में जीत कर जाएँ? फिर क्यों उन्होंने देश भर के वालंटियर्स को बनारस आने का आह्वान किया है. क्या ऐसा नहीं कर सकते थे कि वालंटियर्स को 50 ऐसी सीट्स पर भेजते जहाँ चुनाव में दम पड़ने से सीट निकलने की आशा थी.

अरविन्द ने बनारस के चुनाव को ईगो की लड़ाई बना ली है और जब भी ईगो की लड़ाई होती है तो dictatorship पैदा होती है. और वही मैं देख रहा हूँ... मैं नहीं जाऊंगा बनारस सर जी मैं नहीं जाऊंगा... !

(आम आदमी पार्टी के एक पदाधिकारी से फ़ोन पर हुई बातचीत के आधार पर)

Wednesday, April 2, 2014

बहुत बदल गए अरविन्द... तो भाई हम भी बदल गए... गुड बाय कह दिया...

क्या आपको पता है कि आम आदमी पार्टी ने अपने संविधान में महज सवा साल में ही कितने संशोधन कर दिए है.

अरविन्द केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के संविधान को सार्वजनिक करते हुए इसे अपने वेबसाइट पर भी डाला था और उसको पढ़ कर लाखों लोग पार्टी में जुड़े...
पार्टी में जिस स्वराज की बात की गयी थी उससे प्रभावित होकर मैं भी जुड़ा था. लोकसभा प्रत्याशियों के चयन में जिस पारदर्शिता की बात की गयी थी और जिसकी गारंटी पार्टी के संविधान में भी दी गयी थी वह मूर्त रूप में कहीं प्रदर्शित नहीं हुई. सवाल किया तो पता चला की पार्टी ने तो 31 जनवरी 2014 को ही संशोधन कर दिया है नीचे की सारी शक्तियां पोलिटिकल अफेयर्स समिति को दे दिए गए हैं. . क्यों भाई इसका प्रचार क्यों नहीं किया अरविन्द जी ने.
यही नहीं, कहा था कि लोकसभा के प्रत्याशियों के चयन से पहले एक पैनल बना कर वेबसाइट पर डाला जायेगा और फिर उस क्षेत्र के लोगों से राय ली जाएगी... हमने तो वेबसाइट पर डायरेक्ट प्रत्याशी चयन की घोषणा ही देखी...
बहुत बदल गए  अरविन्द... तो भाई हम भी बदल गए... गुड बाय कह दिया...

Sunday, March 30, 2014

नेक लोगों द्वारा दिए गए चंदे के वीभत्स बंदरबांट की आशंका.

आम आदमी पार्टी ने दान की पारदर्शिता पर अच्छी पहल की है. उसकी इस पहल का लाभ यह हुआ कि अन्य दल भी अब इस ओर कुछ सोचेंगे. अरविन्द केजरीवाल बार-बार लोगों से अपील करते हैं कि पार्टी को चुनाव लड़ना है और धन की आवश्यकता है. उनकी अपील का असर होता है और ऑनलाइन डोनेशन प्रतिदिन लाखों में आजाता है.

आम जन ने दिल खोल कर #AAP को दान दिया है. उसकी दान दाताओं की सूचि देख कर लगता है कि वाकई लोग अपनी नेक कमाई में से पार्टी को चंदा दे रहे हैं.

लेकिन प्रकारांतर से एक बात की उत्सुकता हो रही है कि आम आदमी पार्टी इन चंदों का करती क्या है? किन मदों में खर्च करती है और वे कितने जरूरी या गैर जरूरी खर्चे होते हैं.

पार्टी ने लोकसभा चुनावों में बिना तैयारी के ही 350 प्रत्याशी उतार दिए हैं. ज्यादातर प्रत्याशी क्षेत्र में अपनी हालत देख कर अपना चुनाव अभियान ठप्प कर चुके हैं लेकिन नाममात्र के लिए गतिविधियाँ चला कर और पदाधिकारियों से मिलीभगत करके झूठी रिपोर्टें ऊपर भिजवा रहे हैं कि प्रत्याशी को धन की कमी आड़े आरही है अतः डोनेशन भिजवाया जाये...!

और मुझे पूरी आशंका है कि इस तरह से नेक लोगों द्वारा दिए गए चंदे का एक वीभत्स बंदरबांट होजायेगा.

क्या अरविन्द इस पर रोक लगाने में सक्षम होंगे?? क्यों न खर्चे को भी पारदर्शी किया जाये.

सत्तु

सत्तु

सत्तु सात प्रकार के धान्य मिलाकर बनाया जाता है .ये है मक्का , जौ , चना , अरहर ,मटर , खेसरी और कुलथा .इन्हें भुन कर पीस लिया जाता है

आयुर्वेद के अनुसार सत्तू का सेवन गले के रोग, उल्टी, आंखों के रोग, भूख, प्यास और कई अन्य रोगों में फायदेमंद होता है। इसमें प्रचुर मात्रा में फाइबर, कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि पाया जाता है। यह शरीर को ठंडक पहुंचाता है।

जौ का सत्तू : यह जलन को शांत करता है। इसे पानी में घोलकर पीने से शरीर में पानी की कमी दूर होती है। साथ ही बहुत ज्यादा प्यास नहीं लगती। यह थकान मिटाने और भूख बढाने का भी काम करता है। यह डायबिटीज के रोगियों के लिए काफी फायदेमंद होता है। यह वजन को नियंत्रित करने में भी मददगार होता है।

चने का सत्तू : चने के सत्तू में चौथाई भाग जौ का सत्तू जरूर मिलाना चाहिए। चने के सत्तू का सेवन चीनी और घी के साथ करना फायदेमंद होता है। इसे खाने से लू नहीं लगती।

कैसे करें सेवन

सत्तू को ताजे पानी में घोलना चाहिए, गर्म पानी में नहीं।

सत्तू सेवन के बीच में पानी न पिएं।

इसे रात्रि में नहीं खाना चाहिए।

सत्तू का सेवन अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए। इसका सेवन सुबह या दोपहर एक बार ही करना सत्तू का सेवन दूध के साथ नहीं करना चाहिए।

कभी भी गाढे सत्तू का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि गाढा सत्तू पचाने में भारी होता है। पतला सत्तू आसानी से पच जाता है ।

इसे ठोस और तरल, दोनों रूपों में लिया जा सकता है।

यदि आप चने के सत्तू को पानी, काला नमक और नींबू के साथ घोलकर पीते हैं, तो यह आपके पाचनतंत्र के लिए फायदेमंद होता है .।

सत्तु के सेवन से ज़्यादा तैलीय खाना खाने से होने वाली तालीफ़ ख़त्म हो जाती है और तेल निकल जाता है .।

इसमें बहुत पोषण होता है इसलिए बढ़ते बच्चों को ज़रूर दे ।

Saturday, March 29, 2014

 असफल नहीं हुआ और न ही भटका. उसका प्राथमिक उद्देश्य पूरा हुआ था कि सत्ता इलीट क्लास से निकल कर गाँव और जमीन से निकले लोगों के हाथ में आगई. लालू , पासवान, आदि जब इस आन्दोलन से निकले थे तब वे मासूम ही थे... हाँ बाद में उन्होंने अच्छा उदहारण नहीं पेश किया और वे वैसे ही होगये जिनके खिलाफ खड़े हुए थे. वही परिवारवाद के पोषक और पूंजीवाद के और बड़े समर्थक बन गए.  

राजनीती तो हम दुसरे दलों में भी रह कर ही सकते थे न ?

#AAP के संगठन में आन्दोलनकारी लोगों की अपेक्षा जब से राजनैतिक लोगों की संख्या बढ़ी है तब से अशुभ संकेत मिलने शुरू होगये हैं...

एक आन्दोलन दम तोड़ रहा है और एक राजनीती फल फुल रही है ..

पर राजनीती तो हम दुसरे दलों में भी रह कर ही सकते थे न ?

Wednesday, January 29, 2014

इन्हें आजमाया जाये इस बार !

पंद्रह साल पहले हमारा युवा तब शिशु या किशोर रहा होगा लेकिन तब मैं 'युवा' था.

माना पिछले दस सालों में घोटाले और बेईमानी का अम्बार लग गया , लेकिन उसके पहले के पांच साल भी कोई राम-राज नहीं था, भाजपा राज ही था.

पांच साल में ही जनता को ऐसा त्रस्त कर दिया था इन बगुला-भगतों ने कि जनता ने इन्हें सजा देने के लिए उसी पुरानी कांग्रेस को चुन लिया और दस सालों तक विकल्प-हीनता की स्थिति में उसी कांग्रेस को ढोते रहे.

लेकिन अब इश्वर की महिमा से एक विकल्प मिल गया है. आम आदमी पार्टी वाले अनुभवहीन हो सकते हैं लेकिन भ्रष्ट नहीं हैं. और कुछ मुद्दों पर वे शीघ्र ही और मुखरित होकर सामने आयेंगे.

इन्हें आजमाया जाये इस बार !

Sunday, January 12, 2014

संस्तुति लेने में लगे हैं... #AAP

लगता है सूचना क्रांति ने अपना काम कर दिया है. शहरों को गावों से जोड़ दिया है. विचारों   के प्रवाह का मार्ग प्रशस्त किया है.

जिस भी गाँव में जाता हूँ आम आदमी पार्टी के बारे में बताना नहीं पड़ता. लोग परिचय से आगे की बात से प्रारम्भ करना चाहते हैं.

जीत सुनिश्चित है, सिर्फ लोगों तक पहुच कर उनके साथ बैठने की बात है, और वह काम तो हम और हमारे volunteers कर ही रहे हैं.

इस समय जबकि सभी नेता अपनी टिकट के फेर में दिल्ली या लखनऊ बसे हैं वहीँ #AAP के लोकसभा प्रत्याशी बनने के इच्छुक लोग टिकट पाने के लिए हर विधानसभा के मतदाताओं से संस्तुति लेने में लगे हैं.
जय हो !

Monday, December 23, 2013

समझ तो वह भी गए थे !

शुरू शुरू की बात है जब हमने रामपुर में #आप की अलख जलाई ही थी तो अपनी गतिविधियों को जनता तक पहुचाने के लिए अख़बारों को विज्ञप्ति जारी करते थे. 

हमने पाया कि एक ख़ास अखबार हमारी गतिविधियों को नही छापता था. 

मेरे कुछ साथियों ने कहा कि क्यों न चल कर उनसे बात की जाये.
तब मैंने सुझाया था कि हमें धैर्य धरना चाहिए और अपनी गतिविधियों को बढ़ाये रखना चाहिए और जो बाक़ी के अखबार हमें छाप रहे हैं उतने में ही संतोष करना चाहिए और जो नही छाप रहे हैं उन्हें प्रेस विज्ञप्ति भेजना रोक देना चाहिए.

हमने ऐसा ही किया.

कुछ दिनों बाद उसी अखबार से एक उलाहना भरा फ़ोन आया कि आप लोग हमें विज्ञप्ति क्यों नहीं भेजते ...??
मैंने विनम्रता से उत्तर दिया "भाई साहेब नए लोग हैं हम लोग, भूल वश रह जाता होगा, कल से ही भिजवाना शुरू कर देंगे.

"समझ तो वह भी गए थे"

Saturday, September 14, 2013

हिंदी दिवस.

‎*** " हिंदी दिवस "***

१४ सितम्बर १९४९,को हमारे देश कि संविधान सभा ने हिंदी भाषा को देश कि औपचारिक भाषा का दर्जा प्रदान किया और १४ सितम्बर को " हिंदी दिवस "के रूप में मनाने की घोषणा की | हिंदी भाषा को देवनागरी लिपि में सन १९५० में अनुच्छेद ३४३ के अंतर्गत राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया |

हिंदी भाषा प्रेम, मिलन और सौहार्द की भाषा है,इस भाषा की उत्पत्ति ही इस बात का प्रमाण है | हिंदी मुख्यतः आर्यों और पारसियों की देन है | हिंदी के अधिकतम शब्द संस्कृत,अरबी और फारसी भाषा से लिए गये है और यह भाषा अवधी,ब्रज आदि स्थानीय भाषाओँ का परिवर्धन भी है | इसीलिए तो इस भाषा को "सम्बन्ध भाषा" के नाम से भी जाना जाता है | हिंदी (खड़ी बोली) की पहली कविता प्रख्यात कवी "अमीर खुसरों" ने लिखी थी |
स्वतंत्रता संग्राम के समय तो हिंदी का प्रयोग अपने चरम पर था | भारतेंदु हरिश्चंद्र, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, हरिशंकर परसाई, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन,सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे लेखकों और कवियों ने अपने शब्दों से जन मानस के ह्रदय में स्वतंत्रता की अलख जलाकर इस संग्राम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | महात्मा गाँधी जी के स्वदेशी आन्दोलन में तो अंग्रेजी भाषा का पूर्ण रूप से त्याग कर हिंदी भाषा को अपनाया गया |
हिंदी भाषा का स्वरुप ही अलग है, यह भाषा अत्यंत मीठी और खुले प्रकृति की भाषा है | हिंदी अपने अन्दर हर भाषा को अन्तर्निहित कर लेती है और अपने इसी गुण के कारण ही वर्तमान में विश्व की चौथी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है | यह भाषा केवल एक देश तक सीमित नही है, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, सिंगापुर जैसे कई देशों तक इसका विस्तार है | हिंदी का सरल स्वाभाव इसकी लोकप्रियता को बढ़ा रहा है | कुछ बाधाएँ आयी है इसके मार्ग में,पर हमें पूर्ण विश्वास है कि हिंदी हमारे दिल में यूं ही समाकर हमारी भावनाओं को जन-जन तक पहुंचती रहेगी और राष्ट्रभाषा के रूप में हमे गौरान्वित करती रहेगी |

Sunday, August 25, 2013

एक फेसबुक साथी से साभार...!

आदरणीय,भाजपा के नेतृत्वबृंद 
विगत दिनों जब मोदीजी ओडिशा आए,श्रीजगन्नाथजी के दर्शन के बाद जब उन्होंने भाजपा ओडिशा इकाई के वरिष्ठ नेताओं की पूरी में हुवी एक बैठक को संबोधित किया तोउन्होने कार्यकर्ताओं को संगठन बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण गुरु मंत्र दिया था ! हालाँकि उस गुरु मंत्र को सभी वरिष्ठ नेता ओडिशा में जहाँ भी बैठक में जाते हैं, मिसालके तौर पर कार्यकर्ताओं के सामने बोलना नहीं भूलते! ओडिशा कार्यकर्ताओं में जान फूंकनेवाला मोदीजी का गुरुमंत्र क्या था? उन्होंने एक सीधा सा गणित कार्यकर्ताओं के सामने रखा और वो ये था कि,हम सब यहाँ समुद्र के पास बैठे हैं(पुरी समुद्र तट के एक होटल के सभागार में बैठक हो रही थी) और बहुत हवा चल रही है,यहाँ हवा कि कोई कमी नहीं है,किन्तु यदि आपकी गाड़ी के चक्कों में हवा नहीं है तो क्या इतने पैमाने में हवा होते हुवे भी,हमारे चारों और हवा होते हुवे भी, क्या अपने आप हमारी गाड़ी के चक्कों में हवा भर जाएगी? नहीं ऐसा नहीं हो सकता,उसके लिए हवा भरने के पम्प की जरुरत है! बस इस एक गुरुमंत्र को जिन्हें समझना चाहिए था वो समझ गए और जो नहीं समझे वो फिर कभी समझ भी नहीं सकते! भाजपा के सभी वरिष्ठ नेताओं से,वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से मेरा ये विनम्र अनुरोध है कि वे सभी पहले मोदीजी द्वारा जो मंत्र दिया गया है उसकी गहराई में जाएँ,और कथनी और करनी में समन्वय बनायें तब जाकर लोगों के पास अपना सन्देश लेकर पहुंचाएं! गुटबाजी से उपर उठकर सबको अपना बनाने के भाव अपने में समाने के भाव,और सबसे ज्यादा जो जरुरी है वो है विनम्रता कि भाषा,हमारे भीतर जो विगत दिनों बीजेपी के शासन में मंत्री थे,या किसी निगम के सभापति थे या फिर किसी न किसी बड़े पद पर थे क्या आज भी उनकी बोल चाल कि भाषा में विनम्रता अपनापन,भाईचारा,अहंकार विहीन शब्द ,अकड़ विहीन,आचरण दिखाई दे रहा है? नहीं मुझे तो नहीं लग रहा! प्रांतीय राजनीती में पंचायत,म्युनिसिपेलिटी के चुनाओं का भी असर होता है,किन्तु क्या हम अभी तक जहाँ जहाँ गए वहां के पुराने तथा स्वाभिमानी कार्यकर्ताओं से मिले? हम चाहें तो दस बीस मुख्य पुराने कार्यकर्ताओं से उनके प्रतिष्ठानों पे जाकर,उनके निवाश स्थान पर जाकर मिल सकते हैं! आज भी हमारे ऐसे सैकड़ों कार्यकर्ता हैं जिनकी वहां के स्थानीय लोगों पर पकड़ है,सम्मान है और वो चाहते हैं कि भाजपा शासन में आनी चाहिए,किन्तु उनका अपना स्वाभिमान है,वजूद है,कांग्रेस संस्कृति की तरह वो आपके पीछे पीछे भागनेवाले नहीं हैं ,किन्तु..हाँ हम इतना जरुर करते हैं कि उसको सूचना दे देते हैं और मैसेज द्वारा उसको बोलते हैं कि तुम हमारे पास आवो, एक कमरे में बैठ कर सिर्फ कुछ एक नेताओं से विचार विमर्श कर हम अपनी रन निति बना लेवें वो बेहतर है,या विभिन्न सहरों में गांवों में अनेक कमरों में बैठे असंख्य पुराने कार्यकर्ताओं से विचार विमर्श कर उनको साथ लेकर रन निति बनावें, कौन सी ठीक रहेगी? बस यही है वो पम्प ,और इस प्रकार का काम करनेवाले नेता को,कार्यकर्ता को ही पम्प की भूमिका में अवातिर्ण होना होगा,क्यों कि पहली बार जब हमारी पार्टी या व्यक्ति सत्तासीन हुवा था तब वह अटलजी जैसे अंतररास्ट्रीय और तपे तपाये नेता की हवा,आंधी पर सवार होकर विधानसभा और संसद तक पहुंचा था, हवा के बहाव में बहकर सत्तासीन हुवे थे, वो पहला अवसर था,हम तथा हमारे बारे में ,हमारे मंत्रियों के बारे में उनकी कार्य कुसलता या उनके स्वभाव के बारे में न तो कोई आम कार्यकर्ता जानता था और ना ही आम जनता ही जानती थी,किन्तु आज वो हालात नहीं हैं! उस समय में और इस समय में सिर्फ एक ही समानता है कि उस समय देश अटलजी को प्रधानमंत्री बनाना चाहता था ,और आज देश मोदीजी को प्रधान मंत्री बनाना चाहता है,आज जो हवा चल रही है उसके पीछे उनके खुद के प्रचार के माध्यम ,उनकी खुद की सफलता, लोगों में एक विश्वाश बना है जो संसदीय चुनावों में हमें तब ही देखने को मिलेगा जब हम उसी अनुकूलता से कार्य करेंगे,वरना वो पुर्व मंत्री और पुर्व पदों कि अकड़ और अहंकार से तो आप आगामी पौर पालिका,पौर परिषद् के चुनाओं में भी सफल हो सकेंगे इसमें मुझे तो संदेह नजर आता है!एक बात को हमें सदा याद रखना चाहिए कि पार्टी को नए लोगों से जुड़ना चाहिए,नए खून और नवयुवकों को उनकी संख्या को बढ़ाना अति आवस्यक है,किन्तु ये सब पुराने कार्यकर्ताओं की अवहेलना की सर्त पर नहीं होना चाहिए,वरना हमारी पार्टी में अनुभवी नेताओं का अकाल पड़ जायेगा! जय हो भारत माता की जय,बन्दे मातरम!

(उक्त लेख एक फेसबुक साथी ने मेरे वाल पर लिखा, मन को छूने वाला लगा तो आप तक भी पहुँचाने को जी चाहा)

Tuesday, August 13, 2013

थोडा झटका तो दीजिये..

देश को सभी बदलना चाहते हैं, वर्तमान से कोई संतुष्ट नहीं है. लेकिन बदलाव का स्वरुप क्या हो इस पर सहमती नहीं बनने की वजह से ही घूम फिर कर वही लूटेरे आजाते हैं. 
पहले तो यह तय करना पड़ेगा कि भ्रष्टाचार ही प्रथम वह राक्षस है जिससे निजात पाना है. बाकी समस्याएं अपने आप ख़तम होजायेंगी.
चाहे अलगाव वाद हो या वर्चस्ववाद हो या क्षेत्रवाद , नक्सलवाद या अतिवाद ये सभी मूल रूप से भ्रष्टाचार के कोख से ही जन्म लेते हैं.
विचार करें  और भ्रष्टाचार को सबसे पहले टारगेट करें.
आप जिस भी पार्टी के समर्थक हो उनसे भ्रष्टाचार निवारण पर उनके विचार और उनके आचरण पर सवाल करिए और उत्तर मांगिये कि उन्होंने इस पर क्या किया.
जन लोकपाल, काला धन वापसी, चुनाव सुधार और राईट टू  रिजेक्ट, राईट टू रिकॉल और सूचना का अधिकार आदि को ये दल क्यों नहीं स्वीकार करते हैं.
हम नहीं कहते कि आप अपनी पार्टी से बगावत करिए लेकिन पूछ तो लीजिये कि अगर संसद में वे अपनी हितों पर सत्ताधारी पार्टी के साथ ही दिखेंगे तो फिर हम बदलाव लाने के लिए उन्हें ही क्यों चुनें??
अगर आपके वोट से कोई बदलाव नहीं आ पा रहा है तो अपना वोट बदल दीजिये इस बार.
थोडा झटका तो दीजिये.

Monday, June 3, 2013

Why To Join #AAP. My Priorities and My Party.

We are the largest democratic country and it reflects in number of parties registered with election commission of India.
Apart from the giant Congress and somewhat bigger BJP we have many other political parties/powers such as DMK, AIDMK, Telugu Desham, CPI, Samajwadi Party, BSP, National Conference, Assam Gan Parishad and so on...

The question is how people choose to be a part of any political party.
The answer is PRIORITIES.
Yes, it is the priorities which makes a flow of people towards a political party.
BSP concentrated on socially and historically deprived section of people and it succeeded. BJP came with an idea and agenda of Nationalism and it clicked.
Aam Aadmi Party puts the theory of Zero Tolerance on Corruption.
So all who has come to the conclusion that it is the corruption which is the root cause of all most all the problems are joining, supporting #AAP.

Sunday, February 10, 2013

"भ्रष्टाचार" का मुद्दा नेपथ्य में जाने लगा है.


ये अचानक ही हिन्दू-मुस्लिम वाद कुछ बढ़ सा नहीं गया है ??

चुनाव का माहोल बनते ही "भ्रष्टाचार" का मुद्दा नेपथ्य में जाने लगा है.

कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही साम्प्रदायिकता सूट करती है. जबकि "भ्रष्टाचार" पर दोनों की सांसें अटकती हैं.
ये देखना है कि भ्रष्टाचार-विरोधी जज्बा और माहोल नेपथ्य में न जाने पायें.
बाकि #AAP लोग समझदार हैं :)

Tuesday, November 13, 2012

ग्रीन दीपावली और हम !


दीपावली अपने चरम पर है और धमाके तो पिछले एक हफ्ते से अपनी उपस्थिति दिखा रहे हैं। धमाकों के लिए जिन पटाखों का प्रयोग हम करते हैं उनके निर्माण में आज भी कोई ख़ास वैज्ञानिक प्रगति नहीं हुई है और वे आज भी उसी पुरानी विधि और सामग्रियों से निर्मित होते हैं।

इधर पिछले एक दशक से जहाँ पटाखों से होने वाले पर्यावरण नुक्सान सामने से दिखने लगे और चिंता और जागरूकता सामने आने लगीं वहीँ महंगाई बढ़ने के बावजूद पटाखों की बिक्री का वॉल्यूम बहुत बढ़ा है।

विद्यालयों और इन्टरनेट पर ग्रीन दीवाली की अवधारणा बलवती हो रही है तो वहीँ कुछ लोग इसे धार्मिक अंकुश के रूप में देखने लगे हैं।


Saturday, August 18, 2012

गोपाल कांडा नारायण दत्त तिवारी और मदेरणा की नियति ...

जब भी मैं किसी गोपाल कांडा, नारायण दत्त तिवारी या मदेरणा के बारे में विष-वमन देखता हूँ तो एक पक्षीय  ही नजर आता है. क्या इसमें गीतिका शर्मा, उज्ज्वला शर्मा या भंवरी देवी का कोई रोल नहीं ?

मर्यादा और रख-रखाव को तो इन सब ने जोड़ियों में ही तार-तार किया है. इनमें से कोई भी भोला नहीं था. इनमें से एक कामयाब पुरुष था तो दूसरी महत्वाकांक्षी महिला थी जो सीढ़ी दर सीढ़ी ऊंचा जाना चाहती थीं।
इनमें से कोई भी महिला ऐसी नहीं थी जो इन पुरुषों का बायो-डाटा नहीं जानती हो। सभी जानती थीं की ये शादी शुदा हैं और सिर्फ उनका उपभोग करेंगे। पहली बार जब इन्हें "इनडीसेंट प्रोपोजल" मिला था तब इन्होने क्या चुना .....?..? 

नैतिकता और कामयाबी में से इन्होने एक को चुना।

Friday, July 20, 2012

दो पहिये पर तीन

कोई कानून कब बनाया जाता है ? "जब उसकी मांग उठने लगे"! कोई कानून कब संशोधित किया जाता है ? "जब उसका बार बार उल्लंघन होने लगे"!

कानून तोडना अपराध की श्रेणी में आता है लेकिन जो लोग कानून बनाने अथवा उसको संशोधित करने का अधिकार रखते हैं उन तक शायद बात पहुँचाने के लिए उसका टूटना या तोडा जाना एक नियति है.

मैं मोटर वाहन कानून में एक ऐसे ही प्रावधान की बात कर रहा हूँ और वह है मोटर साइकल पर तीन सवारियों के बैठने का चलन। जब भी सड़क पर चेकिंग की जाती है तो मैं देखता हूँ की तीन सवारियों के बैठने के विरुद्ध चालान काटने की संख्या अन्य के अपेक्षा ज्यादा होती है. मेरा मानना है कि बदलते परिवेश में जबकि लोगों का बाहर निकल कर बाजार हाट में जाना बढ़ गया है ऐसे में वे एक ही सवारी पर सुविधानुसार यदि तीन बैठा कर चल सकते हैं तो उन्हें इसकी छूट होनी चाहिए। वैसे भी आजकल दो पहिया वाहन 100 सी सी से लेकर 350 सी सी तक आरहे हैं अतः तीन सवारियों को बैठाने में व्यावहारिक कठिनाई नहीं आती है।


मैं भी अभी किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा हूँ लेकिन जनभावना और आवश्यकता को देखते हुए मैंने सोचा कि इस विषय को सुधिजन के साथ शेयर किया जाये। 
जब भी जनता का चालान तीन सवारियों पर कटता है तो उन्हें चुभता है उनका तर्क है कि  जब कार वाले बस वाले सीटों की संख्या से ज्यादा सवारियां बैठा सकते हैं तो फिर दो पहिया वाहन वालों को ही क्यों परेशान किया जाता है। 

वैसे अगर आप किसी थाने  के पास रहते हैं तो अकसर ये देखेंगे कि छोटे-मोटे आपराधिक प्रवृत्ति के हिस्ट्री शीटर को उसके घर से पकड़ के लाने के लिए स्वयं पुलिस वाले भी अपनी मोटर साइकल से ही जाते हैं और उसे घर से उठा कर मोटर साइकिल पर बीच में बैठा कर लाते हैं। यानी नियम चाहे जो कहता हो सुविधा जनक स्थिति यही है की तीन सवारियां बैठाई जा सकती हैं।

आपके सुझाव का आकांक्षी :)


विपरीत विश्व प्रवाह के निज नाव जा सकती नहीं,
कल काम में आती नहीं आज की बातें कई।

Sunday, July 8, 2012

फेसबुक ट्विटर और ब्लॉग

कहा गया है कि फेसबुक और ट्विटर अखबार की तरह हैं जिसे रोज लिखा जाता है और रोज पढ़ा जाता है जबकि ब्लॉग पुस्तक की तरह है. अतः अब प्राथमिकता बदलूँगा और ब्लॉग को ज्यादा समय दूंगा। जय हिंद।

Monday, May 30, 2011

Big Battle: Invitation for Bigbattle for panelist

Big Battle: Invitation for Bigbattle for panelist: "Invitation for BigBattle We would like to invite to join in our twitter debate as a panelist !! What is Bigbattle ? Bigbattle' is a weekly ..."

Monday, November 1, 2010

Elected As the President of LAL BAHADUR SHASHTRI SMARAK INTER COLLEGE, Rampur. A Govt aided School. Estd. in 1964-65

Elected unopposed As the President of the management committee of LAL BAHADUR SHASHTRI SMARAK INTER COLLEGE, Madhauli, Rampur. A Govt aided School. Estd. in 1964-65

Thursday, March 25, 2010

Open Letter To The Chairman Nagar Palika Parishad Rampur, Urging Him Not to Construct Shopping Complex by usng Board Funds Which Meant To Facilitate The People with Basic Ameneties.

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Sunday, March 21, 2010

DO WE NEED A SHOPPING COMPLEX OR ROADS WATER TANKS ,SANITATION?

Nagar Palika Parishad Rampur has proposed to build a SHOPPING COMPLEX and the Board Funds will be use to do this which are meant to spent on basic amenities of the citizen. Do we need a shopping complex costing 4 crores or hundreds of roads , water tanks , sanitation etc ? ur views??

Monday, March 8, 2010

women's day

My Mom, my Sister, my Wife, my Daughter today is their Day, Rest they assure for me!
Love You All !!

Wednesday, February 3, 2010

is it congress or shivsena ruling in maharastra??

What is the point of having a Cong CM in Maharashtra if his govt cannot guarantee security to people who stand up to the Shiv Sena?

Sunday, November 22, 2009

किसे डर लग रहा है सूचना के अधिकार कानून से ?


ऐसा लगता है कि जाने-माने बुद्धिजीवियों और सूचना के अधिकार के आन्दोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं की अपील को नज़रंदाज़ करते हुए यू पी ए सरकार ने सूचना के अधिकार कानून'2005 में संशोधन का मन बना लिया है. सरकार इस संशोधन के जरिये सूचना के अधिकार कानून से "फाइल नोटिंग" दिखाने का हक वापस लेने के अलावा जन सूचना अधिकारियों को "फालतू और तंग करनेवाले" सवालों को खारिज करने का अधिकार देना चाहती है. हालांकि इस फैसले का विरोध कर रहे बुद्धिजीवियों और नागरिक संगठनो के एक प्रतिनिधिमंडल से केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के सचिव ने वायदा किया है कि इस मुद्दे पर अंतिम फैसला करने से पहले सरकार सबसे बात करेगी और सबकी आपत्तियों को सुनेगी लेकिन सरकार के रवैये से नहीं लगता है कि वह वास्तव में किसी को खासकर विरोधी स्वरों को सुनने के मूड में है. उसने मन बना लिया है और अब केवल दिखावे की मजबूरी में संशोधन की प्रक्रिया को पारदर्शी दिखाने का कोरम पूरा करना चाहती है. 

ऐसा मानने के पीछे ठोस वजहें हैं. असल में, जब से सूचना के अधिकार का कानून बना है, सत्तानशीं नेता और नौकरशाही उसके साथ सहज नहीं रहे हैं. इस कानून के बनने से पहले तक गोपनीयता के माहौल में काम करने के आदी अफसरों और नेताओं को शुरू से यह बहुत "परेशान और तंग" करनेवाला कानून लगता रहा है. कहने की जरूरत नहीं है कि इसके पीछे वही औपनिवेशिक गोपनीयता की संस्कृति और मानसिकता जिम्मेदार रही है जो आज़ादी के 62 सालों बाद भी तनिक भी नहीं बदली है. यह मानसिकता सूचना का अधिकार कानून बनने के बावजूद यह स्वीकार नहीं कर पा रही है कि अब एक आम आदमी भी उनसे न सिर्फ उनके कामकाज का ब्यौरा और हिसाब मांग सकता है बल्कि परदे के पीछे और चुपचाप फैसला करने का जमाना गया. उनसे उस फैसले तक पहुँचने की पूरी प्रक्रिया यानि फाइल नोटिंग दिखाने के लिए कहा जा सकता है जिसके जरिये एक-एक अधिकारी की जिम्मेदारी तय की जा सकती है.
दोहराने की जरूरत नहीं है कि नेता-नौकरशाही सूचना के अधिकार कानून और खासकर इस प्रावधान को अपने विशेषाधिकारों और अभी तक हासिल असीमित शक्तियों में कटौती के रूप में देखते रहे हैं. यही कारण है कि जन दबावों के बाद और खुद को प्रगतिशील दिखाने के लिए यू पी ए सरकार ने यह कानून तो बना दिया लेकिन कानून को ईमानदारी और उसकी सच्ची भावना के साथ लागू करने के बजाय उसकी राह में रोड़े अटकाने में लगी रही है. यहां तक कि कानून के लागू होने के दो सालों के अन्दर ही सरकार ने उसके दायरे से फाइल नोटिंग दिखाने के अधिकार को वापस लेने के लिए कानून में संशोधन करने की कोशिश की थी लेकिन जन संगठनो और बुद्धिजीवियों के भारी विरोध के बाद उसे अपने कदम वापस खीचने पड़े थे. इस मायने में, इस कानून में संशोधन के नए प्रयास को पिछले प्रयासों की निरंतरता में ही देखना चाहिए.
सवाल यह है कि केंद्र सरकार को सूचना के अधिकार कानून से क्या शिकायतें हैं? जिस कानून को लागू हुए अभी सिर्फ चार साल हुए हैं, उससे सरकार को ऐसी क्या दिक्कत हो रही है कि वह इस कानून के रचनाकारों और समर्थकों के विरोधों को अनदेखा करते हुए उसमे संशोधन के लिए उतारू है? दरअसल, नौकरशाही को घोषित तौर पर इस कानून से दो शिकायतें हैं. पहला, इस कानून का "दुरुपयोग" किया जा रहा है. कुछ निहित स्वार्थी तत्त्व इस कानून का सहारा लेकर फालतू, परेशान और तंग करनेवाले सवाल पूछ रहे हैं जिससे अधिकारियों को काम करने में बहुत दिक्कत हो रही है, उनका काफी समय ऐसे फालतू और बेकार सवालों का जवाब बनने में चला जा रहा है. यही नहीं, इसे विभागीय राजनीति में किसी अधिकारी के साथ हिसाब-किताब चुकता करने या बदला लेने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है.
दूसरी शिकायत यह है कि फाइल नोटिंग दिखाने का अधिकार देने से अधिकारियों को ईमानदारी से और बिना किसी भय के निर्णय लेने में मुश्किल हो रही है क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके द्वारा फाइल पर की गई नोटिंग सार्वजनिक होने पर उन्हें निहित स्वार्थी तत्वों और बेईमानों का कोपभाजन बनना पड़ सकता है. कहने की जरूरत नहीं है कि ये दोनों शिकायतें बहुत कमजोर, तथ्यहीन, एक तरह की बहानेबाजी और गोपनीयता की संस्कृति को बनाये रखने की मांग हैं. जैसेकि खुद सूचना के अधिकार के लिए लड़नेवाली अरुणा रॉय और दूसरे बुद्धिजीवियों-कार्यकर्ताओं ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में भी स्पष्ट किया है कि इस बात के कोई ठोस सबूत नहीं हैं कि इस कानून का इस्तेमाल जानबूझकर "फालतू और तंग" करनेवाले सवाल पूछने के लिए किया जा रहा है और न ही इस बात के कोई प्रमाण हैं कि फाइल नोटिंग दिखाने के अधिकार के कारण ईमानदार और निर्भीक अफसरों को काम करने में दिक्कत हो रही है.
उल्टे सच्चाई यह है कि इस अधिकार के कारण ईमानदार और निर्भीक अफसरों को बिना किसी अवांछित दबाव और भय के फैसला करने में सहूलियत हो रही है. वे उन नेताओं-मंत्रियों-अफसरों को इस कानून और खासकर इस प्रावधान का हवाला देकर उनकी इच्छा के अनुसार नोटिंग करने के दबाव से इंकार कर पा रहे हैं. यह प्रावधान ईमानदार और निर्भीक अफसरों के लिए बडी सुरक्षा साबित हो रहा है जबकि इसके कारण बेईमान और मनमानी करनेवाले अफसरों-नेताओं को मनमाने फैसले करने में जरूर परेशानी हो रही है क्योंकि अब कोई भी फाइल नोटिंग सार्वजनिक करके मनमाने-अवैधानिक-अनुचित फैसलों की जवाबदेही तय करवा सकता है. कहने की जरूरत नहीं है कि इस प्रावधान से नौकरशाही को जिम्मेदार और जवाबदेह बनने के साथ निर्णय लेने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जा सकता है.
रही बात "फालतू और तंग" करनेवाले सवालों को खारिज का अधिकार देने की तो इतना कहना ही काफी है कि अगर इस संशोधन को स्वीकार कर लिया गया तो इस कानून की मूल आत्मा की हत्या हो जायेगी क्योंकि इस प्रावधान का सहारा लेकर कोई भी जन सूचना अधिकारी किसी भी सवाल को "फालतू और तंग" करनेवाले बताकर खारिज कर सकता है. आखिर यह कौन, कैसे और किस आधार पर तय करेगा कि कौन सा सवाल "फालतू और तंग" करनेवाला है? जाहिर है कि इस कानून के तहत पूछे जानेवाले सवालों से अपने भ्रष्टाचार, मनमानेपन, निक्कमेपन और गडबडियों की पोल खुलने के डर से घबराई नौकरशाही ऐसे हर सवाल को "फालतू और तंग" करनेवाला बताकर खारिज करने से नहीं चूकेगी, जिससे उसकी पोल खुलती हो. इसके बाद सूचना के अधिकार कानून में क्या बचेगा? क्या यू पी ए सरकार प्रस्तावित संशोधनों के जरिये इस कानून को ख़त्म करना और एक शोपीस भर बनाना चाहती है?

Saturday, November 7, 2009

न तो शासनादेश के मर्म को समझा गया और न ही इसे लागू किया गया ...

सर्व समाज के विकास के लिए वर्तमान बहुजन समाज पार्टी की सरकार वचनबद्ध है साथ ही राज्य की वंचित जनता को उनके अधिकारों एवं विकास के अवसरों में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए भी यह सरकार प्रयत्न करती रहती है। आरक्षण के माध्यम से काफ़ी कुछ हुआ है लेकिन इसका असर सरकारी नौकरियों में ही ज्यादा हुआ है जबकि सरकारी ठेकेदारी जैसे कुछ क्षेत्र हैं जिनसे वह तबका वंचित ही रहा क्योंकि इन क्षेत्रों में पूंजीपती अपना कब्जा जमाये रहते हैं। यही कुछ सोच कर सरकार ने नगर पालिकाओं के ठेकों में आरक्षण की शुरुआत छोटे ठेकों से की इस कदम का पार्टी के लोगो ने दिल से स्वागत किया और नगर पालिकाओं में भी इसे लागू किया जा चूका है लेकिन रामपुर की नगर पालिका में न तो इस शासनादेश के मर्म को समझा गया और न ही इसे लागू किया गया . कहने को तो पालिका पर बहुजन समाज पार्टी का बोलबाला है लेकिन वास्तव में समाजवादी पृष्ठभूमि से आये हुए पार्टी के ये मेहमान तो सिर्फ अपना वक़्त काट रहे हैं . यही नहीं मैंने बहुत पहले प्रशासन को भी लिखा है लेकिन प्रशासन की गति भी इस मामले में अज्ञात कारणों से सुस्त चल रही है . अबतो एक ही आशा है ऊपर भगवान का और नीचे बहिन जी का . वैसे थोडी शिकायत तो उनसे भी है जो अपने अधिकारों के लिए जागरूक तो हो गए हैं लेकिन सजग नहीं हैं... जय भीम ! जय भारत !!

Saturday, October 17, 2009

दीप पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें!

दीप पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें. 
उजाले का यह पर्व घोर अँधेरे वाले दिन अर्थात अमावस्या वाले दिन मनाया जाता है, है न यह एक और संघर्ष का प्रतीक ? जी हाँ यही सन्देश दिया है हमें हमारी संस्कृति ने कि विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करने के लिए वही उचित समय है जब वह अपने चरम पर हो . तो आज तो बस त्यौहार की बात ... फिर बैठेंगे और अपनी मुहिम को आगे बढायेंगे . 
आपका : मुकेश पाठक 

Wednesday, September 30, 2009

छोटा हाथी

एक पुरानी कहावत है कि माले मुफ्त दिले बेरहम यानी मुफ्त की पायी चीज़ों परहम बेरहम होजाते हैं और उनकी क़द्र नही करते । उदहारण स्वरुप , अगर आप बाज़ार मेंकोई भिवस्तु खरीदते हैं तो हर तरह से उसके दाम का पता लगाते हैं और यह प्रयत्न करतेहैं कि जहाँ से भिमिले लेकिन दो पैसे कम में मिल जाए तो अच्छा । मगर नगर पालिका परिषद् रामपुर में तो उलटी गंगा ही बह रही है। चीज़ें बाजार मूल्य से कहीं ऊँची दरों पर खरीदी जाती है और पता नही कैसे और क्यों वहां बैठे जिम्मेदार लोग इस बात को नज़र-अंदाज़ किए बैठे हैं।
हद तो तब होती है जब वाहन जैसी वस्तुओं पर भी बाजार भाव से ज्यादा का मूल्य स्वीकृत कर लियाजाता है । पहले मुझे विश्वास नही हुआ लेकिन जब मैंने बाजार भाव से ऊँची खरीदारी करने के मामले में काम करना शुरू किया तो समझ में आया कि दर-असल टेंडर प्रक्रिया में ही जानबूझ कर ऐसे झोल निकलेजाते हैं कि भाव ज्यादा से ज्यादा आने का रास्ता बने। नियमानुसार टेंडर निकाले जाने से पहले व्यय अनुमान लिया जाता है और जितने की वस्तुबाजार में प्रचलित मूल्य की होती है उसी के आधार पर उसमें धरोहर राशि रखीजाती है इस प्रकार से यह सुनिश्चित हो जाता है की अनाप शनाप भाव नही आएंगे और उचित भाव पर खरीदारी कर ली जायेगी । जैसे यदि कोई वस्तु एक लाख रूपये की है और दो प्रतिशत से उसकी धरोहर राशि रखी जानी है तो दो हजार रुपये की राशिः रख कर यह सुनिश्चित किया जाता है की कोई भी निविदा दाता एक लाख से ऊपर का भाव नही देगा । लेकिन हाल ही में Tata ACE (जिसे आम बोलचाल में छोटा हाथी कहा जाता है ) की खरीदारी हेतु हुए टेंडर का अध्ययन करने पर समझ में आया ये सारा खेल कैसे खेला जाता है । जनाब चार छोटा हाथी खरीदना था। निविदा में धरोहर राशिः रखी गई पुरे चालीस हजार रूपये यानी रेट देने वालों को मौका दिया गया की वे चार छोटा हाथी नगर पालिका परिषद् रामपुर को बीस लाख तक में दे सकें यांनी एक छोटा हाथी पाँच लाख का। हमने अपनी आपत्ति दर्ज कराइ और टेंडर को निरस्त करने के लिए लिखा । खैर टेंडर पर खरीदारी तो किसी अन्य कारन से नही हुई लेकिन जानते हैं डीलर ने उसपर रेट क्या दिया था .... जी सुना है पाँच लाख के आसपास। ये वही डीलर था जिसने व्यक्तिगत तौर पर मुझे ईमेल करके रेट दिया था दो लाख पिच्चासी हजार और पाँच हजार की छूट अलग से ...
चलो ये भ्रष्टाचार तो हमने रोक लिया लेकिन जो हो चुका है उसका क्या होगा ... जी हाँ पिछले मार्च में इसी तरह से दो ट्रक ख़रीदे गए हैं जिसे अगर आप खरीदते तो छः सात लाख में मिलजाता मगर पालिका ने इसे ख़रीदा है .....(?????) ..... अब सब मैं ही बताऊँ या कुछ आप भी करेंगे ... सुचना के अधिकार का प्रयोग करें जनाब...
जय भीम! जय भारत !

Monday, September 28, 2009

दशहरा की हार्दिक शुभ कामनाएं !

दशहरा की हार्दिक शुभ कामनाएं . आज रावण मरेगा ... सत्य की विजय होगी... राम की जय होगी.   इसीलिए आज के दिन को विजयादशमी भी कहा जाता है. चूँकि यह प्रतीकात्मक होता है इसीलिए अगले साल रावण को फिर मारने की जरूरत होती है . भ्रस्टाचार के लिए भी यही सन्देश है कि तुम जबतक समूल समाप्त नहीं होगे हम तुम्हे मारते रहेंगे . कम से कम  मैं तो यही सोचता हूँ. भ्रस्टाचार से डरिये मत उसका सामना कीजिये तो देखिये कि वह कैसे भागता है. याद रखिये कि हर साल रावण का पुतला बहुत बड़ा होता है और राम मानव रूप में ही होते हैं फिर भी मरना रावण को ही पड़ता है...
जय श्री राम !

Tuesday, September 22, 2009

ईद मुबारक !

सभी क्षेत्र वासियों को ईद की दिली मुबारकबाद !
एक महीने के पवित्र रमजान के बाद ये दिन हासिल होता है जो की खुदा का एक तोहफा ही है . 
तो आज ज्यादा कुछ नहीं लिखूंगा क्योंकि सिमईओं कि खुशबू आने लगी है ...
ईद मुबारक !
:मुकेश पाठक

Sunday, September 20, 2009

एमर्जेंट है...

आप घर बनवाते हैं तो प्रवेश के लिए दरवाजा भी देते हैं और भले लोग घर आने के लिए दरवाजे का ही प्रयोग करते हैं ...हाँ कुछ लोग खिड़की से भी आजाते हैं लेकिन वह लोग या तो चोर होते हैं या असामाजिक होते हैं। लेकिन खिड़की कभी कभी इमर्जेंसी एंट्री या एग्जिट का भी काम करती है। ऐसी ही कुछ परिस्थितियों के लिए कुछ स्थानों पैर वैधानिक जटिलताओ से बचने के लिए एमेर्जेंट का प्राविधान किया जाता है जैसे कि नगर पालिकाओ में छोटी मोटी जरूरतों या खरीदारियों के लिए एमेर्जेंट आइटम्स कि खरीदारी हो सकती है । मूल भावना तो यही होती है कि जनता का काम नही रुके चाहे नियमों में थोडी ढील देनी पड़े (यानी खिड़की खोलनी पड़े ) ।
जानते हैं नगर पालिका परिषद् रामपुर में इस खिड़की का इस्तमाल भी खूब हुआ है ... पता लगा है कि एमेर्जेंट आइटम्स के नाम पर ऐसे ऐसे काम हुए हैं जो आराम से भी किए जा सकते थे यही नही इसी इमरजेंसी के नाम पर एक कामचलाऊ ई ओ से साठ लाख रुपयों कि निकासी करा ली गई।
वैसे सभासदों द्वारा इसका विरोध किया गया था और इसकी जांच चल रही है । मगर हम जैसे लोगों के लिए तो यह अच्छी स्थिति नही है क्योंकि अगर जांच में पालिका दोषी निकली तो लोग हमारी सरकार को बदनाम करेंगे औरभूल जायेंगे कि आख़िर ये मुद्दा नेक नियति से उठाया भी बहुजन समाज पार्टी के लोगों ने ही था। सुना है कि प्रभावित होने वाले लोग इसे पार्टी विरोधी गतिविधि करार देकर हमें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना चाहते हैं । ...हम क्या करें हमारे पास तो कोई इमर्जेंसी का रास्ता भी नही है। हाँ अगर हमने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया तो उनके लिए तो कई रास्ते हैं और नही तो वे अपने पुराने घर कि खिड़की का रास्ता पकड़ लेंगे... जय भीम ! जय भारत!!

Friday, September 18, 2009

रीवाईज कर लेते !

रामपुर के नालों को कभी गन्दा मत कहना ! मालुम है उनकी सफाई पर हर साल अभियान चला कर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं । इसी लिए कह रहा हूँ साहेब गन्दा मत कहना !!
आपको बताएं की इस साल अस्सी नालों की सफाई के लिए अस्सी लाखसे ज्यादा का खर्च होने की स्वकृति बोर्ड की बैठक में रखा गया था । चूँकि एजेंडा तो एक या दो दिन पहले ही मिलता है इसलिए सोचने का ज्यादा मौका होता नही (या दिया नही जाता ) । तो प्रस्ताव पास होगये और नालों की सफाई शुरू होगई (?) ... और ख़तम भी होगई !
वह तो भला हो लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का यानी मीडिया वालों का कि उन्होंने इस मुद्दे पर ध्यान खींचा कि ये खर्च गले से नही उतरने वाला है... खैर प्रशासन भी जागा और जांच बैठा दी गई...
मन में सवाल उठा कि पिछले वर्ष का खर्चा क्या रहा होगा ?? पता लगा की खर्च की स्वीकृति सत्तर लाख से कुछ कम की ही थी तो हमने सोचा की महंगाई बढ़ गई है अगर दस बारह लाख बढ़ गए हैं तो चलता है । लेकिन ... लेकिन जनाब पिछले वर्ष उतनी राशि से काम नही चला था बल्कि एस्टिमेट को रीवाइज करना पड़ा था और कुल भुगतान एक करोड़ बीस लाख का हुआ था। अब ऐसे में अगर पहले ही पता था की मामला करोड़ से ऊपर का होगा तो फिर अस्सी लाख का बजट क्यों दिया . हाँ समझा रीवाईज कर लेते ...